धर्मशाला। पिछले गुरुवार को चीन-ब्रिटिश संयुक्त घोषणा की ४०वीं वर्षगांठ पर ब्रिटिश संसद के ऊपरी सदन- हाउस ऑफ लॉर्ड्स- के सदस्यों ने चीन के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति पर चर्चा की। विशेष रूप से तिब्बत, हांगकांग, ताइवान और दक्षिण चीन सागर में चीनी कार्रवाइयों से उत्पन्न मानवाधिकारों और सुरक्षा मुद्दों के संबंध में और पूर्वी तुर्किस्तान में उग्यूरों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों के संबंध में चर्चा की गई।
सत्र के दौरान लॉर्ड डेविड एल्टन के नेतृत्व में हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्यों के एक समूह ने उपरोक्त क्षेत्रों में पीआरसी द्वारा मानवाधिकारों के निरंतर उल्लंघन के साथ-साथ सीमा पार दमन और जासूसी को बढ़ाने पर अपनी चिंता जताई। इस समूह में लॉर्ड मार्टिन कैलनन, बैरोनेस स्मिथ, लॉर्ड बिशप और बैरोनेस बैनेट शामिल थे। समूह ने चीन के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विभिन्न पहलुओं की भी समीक्षा की।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि लॉर्ड मार्टिन कैलनन ने तिब्बत की वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति को वैश्विक चेतना से सुनियोजित तरीके से मिटाने के पीआरसी के प्रयासों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ‘तिब्बती संस्कृति, धर्म और पहचान को मिटाने के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का दशकों पुराना अभियान अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अंतरात्मा पर एक दाग है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बहुत समय पहले तक तिब्बत एक स्वतंत्र देश था। लेकिन अब कोई भी इसे इस रूप में नहीं जानता है। यह वास्तव में चीन में समाहित हो गया है और तिब्बती लोगों को धीरे-धीरे मिटा दिया गया है। मुझे कुछ साल पहले धर्मशाला स्थित निर्वासित घर में दलाई लामा से मिलने का सम्मान मिला था। मैं उनके धर्म को नहीं मानता, लेकिन वे एक प्रेरणादायक चरित्र हैं, जो तिब्बती लोगों के सामने आने वाले सभी खतरों और वास्तव में जनसंहारों के बावजूद अहिंसा का उपदेश देते रहे हैं।’