
धर्मशाला। निर्वासित तिब्बती संसद के स्पीकर खेन्पो सोनम तेनफेल ने ०१ नवंबर २०२४ को उत्तरी सिक्किम के तुमलोंग में माइंडरोलिंग जांग-डोक-पलरी मंदिर के उद्घाटन समारोह में भाग लिया और उसे संबोधित किया।
समारोह में कई प्रतिष्ठित रिनपोछे मौजूद रहे। इनमें क्याब्जे मिनलिंग खेंचेन रिनपोछे, क्याब्जे खोछेन रिनपोछे, जेसुन खांड्रो रिनपोछे, पेनम रिनपोछे के साथ ही सिक्किम के मुख्यमंत्री श्री प्रेम सिंह तमांग-गोले, स्पीकर खेन्पो सोनम तेनफेल, सिक्योंग पेन्पा शेरिंग, सुरक्षा कालोन (मंत्री) ग्यारी डोल्मा, सांसद खेन्पो जम्पेल तेनज़िन और सिक्किम सरकार के धार्मिक मामलों के मंत्री सोनम लामा जैसे गणमान्य व्यक्ति शामिल थे। इस धार्मिक समारोह के दौरान मिनलिंग त्से-चू चेमो चाम नामक एक विशेष अनुष्ठानिक नृत्य किया गया।
अपने संबोधन में स्पीकर ने अपनी शुभकामनाएं दीं और मिंड्रोलिंग जांग-डोक-पलरी की स्थापना की धार्मिक वृत्ति पर प्रकाश डाला। इस दौरान उन्होंने उत्कृष्टता के पांच प्रमुख पहलुओं- शिक्षक, स्थान, शिक्षण, समय और अनुचर- पर जोर दिया।
सिक्किम में स्थित इस मंदिर को बेयुल के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान गुरु पद्मसंभव से आशीर्वाद प्राप्त भूमि है। इस मंदिर की स्थापना गुरु पद्मसंभव के ज्ञान को धारण करने वाले महान गुरुओं की उपस्थिति में की गई थी। इसमें गुरु त्सेन-ग्ये के गरचम की उत्कृष्ट शिक्षाओं को स्थान दिया गया। यह पवित्र स्थान त्से-चू के शुभ मुहूर्त और सिक्किम में गुरु पद्मसंभव के अनुयायियों के असाधारण दल की उपस्थिति के लिए भी जाना जाता है।
स्पीकर ने इस उल्लेखनीय उपलब्धि का श्रेय क्याब्जे खोछेन रिनपोछे को दिया और रिनपोछे तथा उन उदार लाभार्थियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया, जिन्होंने अपना योगदान देकर मंदिर की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मंदिर को सभी बौद्धों के लिए पुण्य और लाभ का स्रोत बताया।
सिक्किम में बौद्ध धर्म के प्रसार पर अपनी टिप्पणी में स्पीकर ने इस बात पर जोर दिया कि आठवीं शताब्दी में तिब्बत की यात्रा के दौरान गुरु पद्मसंभव ने सिक्किम को आशीर्वाद दिया था, जिसके कारण इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का विकास हुआ। उन्होंने कहा कि सिक्किम को गुरु पद्मसंभव का आशीर्वाद प्राप्त बेयूल या छिपी हुई भूमियों में से एक माना जाता है।
आगे स्पीकर ने तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद की स्थिति पर अपना विचार रखा। उन्होंने याद किया कि कैसे परम पावन दलाई लामा ८०,००० से अधिक तिब्बतियों को भारत में निर्वासन में लेकर आए, जिनमें से हजारों सिक्किम में बस गए। उन्होंने तिब्बत और सिक्किम के लोगों के बीच साझा धर्म और संस्कृति के माध्यम से बने गहरे संबंधों पर प्रकाश डाला और राज्य में रह रहे तिब्बती शरणार्थियों के प्रति अटूट समर्थन के लिए सिक्किम सरकार और लोगों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की।
स्पीकर ने अपने संबोधन का समापन परम पावन दलाई लामा, क्याब्जे मिनलिंग खेंचेन रिनपोछे, क्याब्जे खोछेन रिनपोछे, जेत्सुन खांड्रो रिनपोछे, पेनम रिनपोछे और अन्य महान गुरुओं की लंबी आयु और उनकी महान आकांक्षाओं की शीघ्र पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हुए किया। उन्होंने चीन-तिब्बती संघर्ष के शीघ्र समाधान के लिए भी प्रार्थना की।