
निर्वासित तिब्बत सरकार के नवनिर्वाचित सिक्योंग अर्थात् राजप्रमुख पेंपा त्सेरिंग द्वारा 27 मई, 2021 को कार्यभार संभालने के साथ ही चीन सरकार के साथ वार्ता पुनः प्रारंभ होने की संभावना बढ़ गई है। अपने संबोधन में पेंपाजी ने स्पष्ट कर दिया है कि तिब्बत समस्या का हल निकालने के लिये चीन के साथ वार्ता शीघ्र प्रारंभ करनी होगी। चीन सरकार अपने ही संविधान एवं राष्ट्रीयता कानून के अनुसार तिब्बत को ‘‘वास्तविक स्वायत्तता’’ प्रदान करे। प्रतिरक्षा तथा विदेष विभाग चीन के पास रहें। षिक्षा एवं धर्म, संस्कृति समेत अन्य सभी विभाग तिब्बतियों को सौंपे जायें। इस व्यवस्था से चीन की एकता-अखंडता और संप्रभुता सुरक्षित रहेगी। इससे तिब्बत को भी स्वषासन का अधिकार मिल जायेगा। इस व्यवस्था से तिब्बत एवं चीन समान रूप से लाभान्वित होंगे। इसी व्यवस्था को मिडल वे या ‘‘मध्यम मार्ग’’ कहा जाता है। निर्वासित तिब्बत सरकार पूर्ण स्वतंत्रता की मांग छोड़कर तिब्बत के लिये केवल ‘‘वास्तविक स्वायत्तता’’ के पक्ष में है। चीन सरकार के साथ वार्ता का महत्वपूर्ण बिन्दु यही है।
लोकतांत्रिक तरीके से तिब्बती जनता द्वारा निर्वाचित नये सिक्योंग के शपथ-ग्रहण समारोह में परमपावन दलाई लामा द्वारा निवर्तमान सिक्योंग डाॅ0 लोबजंग संग्ये के तिब्बती संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा की गई तथा नये सिक्योंग पेंपा त्सेरिंग को सफलता हेतु शुभकामना दी गई। दलाई लामा का आषीर्वाद, प्रेरणा एवं प्रोत्साहन तिब्बती संघर्ष को शांतिप्रिय एवं अहिंसक बनाये रखने के लिये जरूरी है। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा पहले स्वयम् राजप्रमुख होते थे। लेकिन वर्तमान दलाई लामा ने तिब्बत एवं तिब्बतियों में लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिये अपने समस्त राजनैतिक अधिकार तिब्बती जनता द्वारा मतदान के जरिये निर्वाचित तिब्बती संसद एवं सिक्योंग को एक दषक पहले ही सौंप चुके हैं। अब वे सिर्फ धार्मिक कार्यों तक ही स्वयंम् को सीमित कर चुके हैं। नवनिर्वाचित सिक्योंग पेंपा त्सेरिंग का संकल्प इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और भी प्रभावी बनाने का है। सरकार की कार्यपालिका, विधानपालिका तथा न्यायपालिका और अन्य समस्त संवैधानिक संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं का लोकतंत्रीकरण जनता का सषक्तीकरण करेगा। तिब्बती जनता का, जनता के लिये तथा जनता द्वारा संचालित व्यवस्था ही तिब्बती लोकतंत्र का लक्ष्य है।
तिब्बती निर्वाचत आयोग द्वारा 14 मई, 2021 को नवनिर्वाचित सांसदों तथा सिक्योंग के नाम की घोषणा होते ही तिब्बतियों एवं तिब्बत समर्थकों में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसन्नता देखने को मिली। बधाई एवं शुभकामना देने वालों में विष्व के सभी लोकतांत्रिक देष, संगठन तथा महत्वपूर्ण व्यक्ति शामिल हैं। तिब्बती संघर्ष में वर्षों से सक्रिय रहे तथा विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक दायित्व निभाने वाले पेंपा त्सेरिंग के प्रभावी कार्य व्यवहार का उन्हें पूरा विष्वास है। उनके द्वारा प्रेषित बधाई एवं शुभकामना से स्पष्ट है कि तिब्बती संघर्ष में अन्तरराष्ट्रीय सहयोग और समर्थन बढ़ता ही जा रहा है।
नवनिर्वाचित तिब्बती सांसदों एवं सिक्योंग के लिये उपयुक्त अवसर है कि वे दलाई लामा द्वारा 14 मई, 1989 को घोषित पंचेन लामा गेदुन चुकी नीमा की शीघ्र रिहाई हेतु चीन सरकार पर दबाव बढ़ायंे। चीन सरकार ने 17 मई, 1989 को ही पंचेन लामा का सपरिवार अपहरण कर लिया था। चीन के वुहान से पूरे विष्व में फैलाई गई कोरोना महामारी के कारण इस वर्ष मई में आॅनलाईन आयोजन के जरिये साम्राज्यवादी चीन से अपील की गई है कि वह तिब्बतियों के धार्मिक मामले में अनुचित एवं अनावष्यक हस्तक्षेप करना बंद करे। इस विषय में निर्णय का अधिकार तिब्बती समुदाय तथा धर्मगुरुओं को है। दलाई लामा समेत अन्य सभी महत्वपूर्ण धर्मगुरुओं के पुनर्जन्म का निर्णय सिर्फ तिब्बती परंपरानुसार किया जायेगा।
विष्व की संपूर्ण लोकतांत्रिक शक्तियाँ तिब्बतियों के धार्मिक अधिकार के समर्थन में हैं, क्योंकि यह एक मौलिक अधिकार है। इसकी जडं़े प्राचीन भारत की नालंदा परंपरा में निहित हैं। इसी माह में दलाई लामा ने विभिन्न संस्थाओं को आॅनलाईन संबोधित करते हुए उन्हें शांति, अहिंसा, करुणा, प्रेम तथा सहयोग का वातावरण मजबूत करने की सलाह दी है। उन्हें वे नालंदा परंपरा के मानवीय मूल्य कहते हैं। वे सदैव इनके प्रचार-प्रसार में लगे रहते हैं। उनके ऐसे प्रयासों से ही तिब्बत का प्रष्न अन्तरराष्ट्रीय प्रष्न बना हुआ है। नवनिर्वाचित तिब्बती सांसदों एवं सिक्योंग पेंपा त्सेरिंग इन्हीं मानवीय मूल्यों को मजबूत करते हुए तिब्बती संघर्ष को नई ऊर्जा प्रदान करेंगे, ऐसा सभी तिब्बतियों और तिब्बत समर्थकों को विष्वास है।
लेकिन तिब्बती संघर्ष में सबसे बड़ी बाधा धर्मविरोधी साम्यवादी चीन की साम्राज्यवादी नीति है। अपनी विस्तारवादी तथा साजिषपूर्ण नीति के अनुरुप चीन सरकार अपने सभी पड़ोसी देषों के राष्ट्रीय हितों को चोट पहुँचा रही है। गलवान घाटी में चीन को करारा जवाब देने के बाद भारत सरकार लगातार चीन के साथ वार्ता कर रही है। भारत सीमा पर शांति बनाये रखने के पक्ष में है, लेकिन चीन सरकार शांति वार्ता में तय तथ्यों की उपेक्षा करते हुए सीमा पर अपनी सामरिक स्थिति मजबूत करने में लगी है। यह कूटनीतिक विष्वासघात का अस्वीकार्य उदाहरण है। चीन को भारतीय संसद द्वारा 14 नवंबर, 1962 को पारित सर्वसम्मत संकल्प की पूरी जानकारी है जिसमें चीन के कब्जे से भारतीय भूभाग को मुक्त कराने का प्रण लिया गया है। फिर भी चीन सरकार भारत के नये-नये क्षेत्रों को हथियाने की साजिष में लगी है।