धर्मशाला। दो दिवसीय तिब्बत-मंगोल संबंध सम्मेलन आज ०२ अप्रैल २०२४ को एक संक्षिप्त समापन सत्र के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। इस सम्मेलन में निर्वासित तिब्बत सरकार के सिक्योंग पेन्पा छेरिंग ने भाग लिया।
इस प्रथम सम्मेलन की सफलता की प्रशंसा करते हुए प्रतिनिधि तेलो रिनपोछे ने आने वाले वर्षों में इसी तरह की बैठकों के आयोजन के माध्यम से दोनों समुदायों के बीच घनिष्ठ संबंधों की पुनर्स्थापना पर जोर दिया। उन्होंने तिब्बत नीति संस्थान से तिब्बत और उसके सबसे लंबे समय के ‘सहयोगी’ रहे मंगोल के बीच संबंधों का गहन अध्ययन करने के लिए एक शोध दल बनाने का अनुरोध किया।
अपने समापन संबोधन में तिब्बत नीति संस्थान के निदेशक दावा छेरिंग ने घोषणा की, ‘इस ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन के समाप्त होने के साथ ही तिब्बत और मंगोलों के बीच संबंध की बहाली का एक नया चरण शुरू हो गया है।’ दोनों समुदायों के बीच सदियों पुराने संबंधों की फिर से स्थापना के बाद उन्होंने संपूर्ण भव्य प्राणियों के लाभ के लिए तिब्बती बौद्ध धर्म की साझा विरासत को संरक्षित और बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने आगे कहा कि सम्मेलन के दौरान वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत विषयों को संकलन कर एक पुस्तक जल्द ही तिब्बत नीति संस्थान द्वारा प्रकाशित की जाएगी।
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के सिक्योंग पेन्पा छेरिंग ने सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं देते हुए सभा को मध्यम मार्ग दृष्टिकोण की नीति के माध्यम से तिब्बत-चीन संघर्ष को हल करने के लिए १६वें कशाग की दृढ़ प्रतिबद्धता के बारे में बताया। इसकी परिकल्पना परम पावन ने की थी। मध्यम मार्ग दृष्टिकोण को दलाई लामा और निर्वासित तिब्बती संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया था। तिब्बती राजनीतिक नेता ने विभिन्न रणनीतियों के माध्यम से तिब्बत की ऐतिहासिक स्वतंत्रता की स्थिति की आधिकारिक मान्यता प्राप्त करने के सीटीए के प्रयासों के बारे में भी जानकारी दी। इसमें समान विचारधारा वाले देशों में प्रस्ताव पारित कराना और डॉ. माइकल वैन वॉल्ट वैन प्राग और प्रोफेसर होन-शियांग लाउ के प्रकाशनों में शामिल सटीक विवरणों का प्रसार करना शामिल है।