थेक्चेन चोलिंग, धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश, भारत। आज २५ दिसंबर की दोपहर कड़कड़ाती, चमकदार ठंड के दिन सुबह सुबह परम पावन दलाई लामा अपने निवास से मुख्य तिब्बती मंदिर- सुगलागखांग की ओर चले, जहां लगभग ३५०० लोग जे. सोंगखापा के निधन का स्मरण दिवस या गंडेन नगा चो मनाने के लिए उपस्थित थे। मंदिर प्रांगण से होकर मंदिर के चारों ओर से परिक्रमा करते हुए उन्होंने मुस्कुरा कर भीड़ में मौजूद लोगों की ओर हाथ हिलाया।मंदिर के अंदर परम पावन ने बुद्ध की मूर्ति और लामा चोपा योग्यता क्षेत्र की एक बड़ी थंगका पेंटिंग के सामने अपना आसन ग्रहण किया। उनकी दाईं ओर लिंग रिनपोछे और नामग्याल मठ के लोबपोन विराजमान हुए। उनकी बाईं ओर नामग्याल मठ के मठाधीश और सेरा-मे मठ के पूर्व मठाधीश आसीन हुए।
समारोह की शुरुआत ‘तीन सातत्यों में प्रार्थना’ के पाठ से हुई, जिसके बाद ‘आध्यात्मिक गुरु को अर्पण’, ‘लामा चोपा’, मंडल अर्पण, बोधिसत्व और तांत्रिक प्रतिज्ञाओं की समीक्षा, स्वीकारोक्ति के छंद और फिर जे. सोंगखापा की स्तुति में नौ पंक्ति की ‘मिग-से-मा’ प्रार्थना हुई।इसके बाद जमयांग चोजे द्वारा ‘जे. सोंगखापा की गुप्त जीवनी’ का जाप किया गया। इसके बाद ‘पूर्वी पर्वत की चोटी से’ स्तुति की गई और सातवें दलाई लामा की संक्षिप्त गुरु-योग प्रार्थना की गई, जिसमें जे. रिनपोछे को अपने लामा के समान ही आमंत्रित किया गया।
‘सोग’, भोज अर्पण के बाद ‘स्प्रींग सॉंग (वसंत रानी) का गीत’ गाया गया। तत्पश्चात्, ‘आध्यात्मिक गुरु को अर्पण’ पर लौटते हुए मार्ग के विभिन्न चरणों की समीक्षा की गई।
इसके बाद ‘मंजुश्रीनामसंगीति’, ‘मंजुश्री के नामों का जप’ के साथ ही गुह्यसमाज, चक्रसंवर, वज्र-भैरव और कालचक्र की स्तुति के श्लोकों का पाठ किया गया। इसके बाद गुह्यसमाज, चक्रसंवर, वज्र-भैरव और कालचक्र की इष्ट सिद्धि करनेवाली प्रार्थनाएं की गईं।
‘ऑफरिंग टू द स्प्रिच्यूल मास्टर (आध्यात्मिक गुरु को अर्पण)’ का पाठ समाप्त हुआ। इसके बाद समर्पण प्रार्थनाएं जिसमें वज्र-भैरव तंत्र की शुभ प्रार्थना, उनके दो शिक्षकों द्वारा परम पावन की दीर्घायु के लिए प्रार्थना, ‘सत्य के शब्द’ और समंतभद्र प्रार्थना के समर्पण छंद शामिल हैं- का गायन हुआ।अंत में ‘सोंगखापा की शिक्षाओं के प्रसार के लिए प्रार्थना’ की बारी आई, जिसमें कहा गया था कि ‘आपने शून्यता और करुणा को मिलाकर मार्ग स्पष्ट किया’ जिसे दिलगो खेंसे रिनपोछे ने परम पावन से लिखने का अनुरोध किया था और महान पांचवें दलाई लामा के लेखन से दोलग्याल पर नियंत्रण करने की अपील की।
इसके बाद परम पावन अपने आसन से उठे और कुछ क्षणों तक मंदिर में उपस्थित भिक्षुओं पर दृष्टिपात करते रहे। इस समय उनके चेहरे पर खुशी के भाव थे। उन्होंने भिक्षुओं का अभिवादन किया। इधर, जब मंत्र-गुरु ने सोंगखापा के गुणों के उत्सव में ‘मिग-त्से-मा’ प्रार्थना के पाठ में मंडली का नेतृत्व किया, उधर परम पावन मंदिर से बाहर निकले और मुस्कुरा कर हाथ हिलाते हुए लिफ्ट की ओर चले गए। मंदिर प्रांगण के किनारे पर वे एक गोल्फ कार्ट में सवार हुए जो उन्हें उनके निवास स्थान पर वापस ले गई।